इस साल के यूएन जलवायु सम्मेलन में 1,600 से ज़्यादा जीवाश्म ईंधन लॉबीकर्ता पहुंचे हैं।
यानी सम्मेलन में हर 25 प्रतिभागियों में से 1 लॉबिस्ट है।
यह अब तक किसी भी जलवायु सम्मेलन में ऑइल और गैस उद्योग प्रतिनिधियों की सबसे ज्यादा हिस्सेदारी है।
सवाल उठता है: क्या फॉसिल फ्यूल का दौर खत्म होगा जब नियम वही लोग बना रहे हैं जो इससे फायदा उठाते हैं?
जलवायु कार्यकर्ता ने इसे ‘मुर्गीखाने में लोमड़ी बुलाने जैसा’ या ‘बिल्ली को दूध के पहरे’ पर बिठाने जैसा बता रहे हैं।
‘किक बिग पॉल्यूटर्स आउट’ गठबंधन ने रिसर्च में पाया कि लॉबिस्टों की संख्या हर देश के दल से अधिक है — केवल ब्राज़ील को छोड़कर।
इस बार 1,602 लॉबिस्ट आए, जो पिछले साल की तुलना में 12% अधिक है।
लॉबिस्टों को उन 10 देशों के कुल प्रतिनिधियों से दो-तिहाई ज्यादा पास मिले जो जलवायु आपदाओं से सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं।
लगभग 599 लॉबिस्ट देशों के आधिकारिक दलों के साथ अंदर पहुंचे, इसलिए उन्हें बंद-दरवाज़े वार्ताओं तक सीधी पहुँच मिली।
बड़े तेल कंपनियों ने दशकों तक जलवायु विज्ञान छुपाया और जनता में संदेह फैलाया।
एक्सॉन के वैज्ञानिक 1977 से जानते थे कि फॉसिल फ्यूल धरती को गर्म करती है, लेकिन कंपनी ने इसे छुपाया।
पेरिस समझौते (2015) के बाद भी दुनिया के 60 बड़े बैंकों ने 6.9 ट्रिलियन डॉलर फॉसिल फ्यूल कंपनियों को दिए हैं।
बाकू सम्मेलन के बाद से ही 250 अरब डॉलर के नए तेल-गैस प्रोजेक्ट मंज़ूर किए गए हैं।
भारत के पास हित-संघर्ष (Conflict of Interest) के मजबूत नियम हैं; भारत इन्हें वैश्विक जलवायु वार्ताओं में लागू करने की मांग कर सकता है।
450 से अधिक संगठन संयुक्त राष्ट्र से यह मांग कर रहे हैं कि फॉसिल फ्यूल उद्योग को नीति-निर्माण से दूर रखने के लिए औपचारिक नियम बनाए जाएँ — जैसे WHO की तंबाकू संधि में है।
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