भारत में वनों की कटाई अब छुपी नहीं बल्कि सार्वजनिक दृष्टि में हो रही है। हिमाचल प्रदेश के चम्बा में अगस्त की बाढ़ के दौरान रावी नदी कटे हुए दर्जनों लॉग्स (पेड़ के कटे तनों) को साथ बहाती आई — यह संकेत था कि वनों की अवैध कटाई स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को खामोशी से खोखला कर रही है। इस घटना ने सुप्रीम कोर्ट का ध्यान आकर्षित किया। चीफ़ जस्टिस बी.आर. गवई एवं जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने ये वीडियो “प्रारंभिक रूप से अवैध” वृक्षों की कटाई का संकेत बताते हुए पर्यावरण, जल शक्ति और संबंधित मंत्रालयों को जवाब तलब किया कि इस समस्या को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
बड़े पैमाने पर वनों की क्षति: अवैध कटाई और बड़े परियोजनाओं का दबाव
वनों पर दबाव सिर्फ स्थानीय उपयोग और तस्करी तक सीमित नहीं है — बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक परियोजनाएं भी भारी मात्रा में वनक्षति का कारण बन रही हैं:
निकोबार में बड़े बंदरगाह-शहर परियोजना (Great Nicobar port-city project) लगभग 130 वर्ग किलोमीटर प्राइमरी वर्षावन को साफ कर सकती है — 10 लाख से 1 करोड़ तक वृक्षों की कटाई हो सकती है।
- केन-बेतवा लिंक परियोजना में भी लगभग 4 लाख वृक्ष कटने का अनुमान है।
- हसदेव अरण्य में आदानी की कोयला ब्लॉक परियोजना 3.68 लाख वृक्षों की कटाई का कारण बन सकती है।
- अरुणाचल प्रदेश में दिबांग बहुउद्देश्यीय परियोजना 3.2 लाख वृक्षों और एटलिन जलविद्युत परियोजना 2.7 लाख वृक्षों की कटाई करेगी।
- पर्यावरण मंत्रालय द्वारा 2020–22 के बीच स्वीकृत परियोजनाएँ ही लगभग 23 लाख वृक्षों को कटाने का मार्ग प्रशस्त कर चुकी हैं।
इन परियोजनाओं के लिए अक्सर प्रस्तावकों से अपेक्षा की जाती है कि वे जितनी संख्या में वृक्षों को काटें, उससे अधिक संख्या में नये वृक्ष लगाएँ। लेकिन यहाँ समस्या यह है कि प्लांटेशन और मूल वनों में चरित्र का अंतर है — एक जगह पर कर दिया गया सामूहिक वृक्षारोपण कभी भी जटिल पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता से भरपूर जंगल की भरपाई नहीं ले सकता।
‘वन क्षेत्र वृद्धि’ का भ्रम
आधे दशक से, भारत में वन क्षेत्र में वृद्धि का दावामान किया जाता रहा है — आंकड़ों के मुताबिक:
- 1980 में जंगलों का अनुपात लगभग 18.34% था।
- 1991 में यह बढ़कर 19.44% हुआ, 2003 में 20.64%, 2011 में 21.05% और 2023 में 21.76% तक पहुँच गया।
परन्तु यह वृद्धि ‘वन’ की विस्तार की सच्ची वृद्धि नहीं है — ये आंकड़े वन और पौधरोपण (प्लांटेशन) को एक साथ मिला कर तैयार किए जाते हैं। वन सर्वेक्षण (FSI) की इन् व्याख्याओं में:
- ऐसी भूमि को भी वन माना जाता है जिसमें 1 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र हो और वृक्ष आवरण (canopy density) 10 % से अधिक हो।
- निजी भूमि उपयोग, वृक्षों की किस्म या जैव विविधता इन आंकड़ों में नहीं देखे जाते।
इसका मतलब है कि घने मूल जंगलों का क्षरण जारी रहने के बावजूद, हम वृक्षों के व्यापक वितरण के कारण कुल वन क्षेत्र बढ़ा हुआ देख रहे हैं। लेकिन यह वन्य पारिस्थिति (forest ecosystem) की वसूली नहीं है।
वास्तविक परिवर्तन की आवश्यकता
मूल वनों की रक्षा और पुनरुद्धार के लिए दो महत्वपूर्ण उपाय अनिवार्य हैं:
- अवैध लकड़ियों की कटाई को नियंत्रण करना, चाहे वह स्थानीय उपयोग हो या तस्करी — विशेष रूप से कीलो जैसे मांग वाले पेड़।
- उच्च गुणवत्ता वाले वनीकरण को बढ़ावा देना — ऐसे रोपण जो मूल जंगलों की जैव विविधता, स्थानीय रूप से उपयुक्त प्रजातियों और पारिस्थितिकी तंत्र के अनुकूल हों। उदाहरण स्वरूप, राजस्थान का राव जोधा नेशनल पार्क और नरकुला का वनीकरण कार्य इस दिशा में सकारात्मक कदम हैं।
निष्कर्ष
वीडियो में बहती कटे हुए लॉग्स, सुप्रीम कोर्ट की सतर्कता, बड़े योजनाओं द्वारा वनक्षय, और वन पौधारोपण के मिश्रित आंकड़ों के बीच एक स्पष्ट संदेश उभरता है:
भारत में जंगल घट रहे हैं — लेकिन हम वृद्धि दर्ज कर रहे दिखते हैं
मूल जंगल और जैव विविधता केवल वृक्षों की संख्या नहीं, उनकी संरचना, पारिस्थितिकी और स्थानीय संयोजन है। यदि कटाई और दबाव जारी रहे — और पौधरोपण को एक व्यापार की तरह किया जाए — तो यह भ्रम ही हमारा बर्बादी का मार्ग बनेगा।
M Rajshekhar
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